“इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।”
घोड़े से सिर्फ़ एक जिस्म नहीं गिरा था…
उस दिन इंसानियत, हक़ और इंसाफ़ के सीने पर वार हुआ था।
कर्बला के मैदान में, रेत थी तपती हुई,
प्यासे थे हुसैन, पर रूह थी जगमगाती हुई।
आसमाँ भी रो पड़ा, ज़मीं काँप उठी थी,
ख़ून से तारीख़ ने इक सच्चाई लिखी थी।
सच्चाई लिखी थी…
हाए हुसैन! तुम्हारी क़ुर्बानी रुला देती है,
दिलों को झिंझोड़ के, इक आग जगा देती है।
ख़ून का हर क़तरा ये दर्स सिखाता है,
ज़ुल्म के आगे सर झुकाना, मौत कहलाता है।
हवाओं में आज भी, वो पुकार गूँजती है,
बातिल के सामने बस, इक़रार गूँजती है।
“सर कटा सकते हैं, पर सर झुका नहीं सकते,”
मोमिन की शान यही, हम भुला नहीं सकते।
ज़ुल्म के आगे सर झुकाना नहीं,
हक़ पे जाँ लुटाना ही, मोमिन का फ़ख़्र है।
मोमिन का फ़ख़्र है!
हाए हुसैन! तुम्हारी क़ुर्बानी रुला देती है,
दिलों को झिंझोड़ के, इक आग जगा देती है।
ख़ून का हर क़तरा ये दर्स सिखाता है,
ज़ुल्म के आगे सर झुकाना, मौत कहलाता है।
हाए हुसैन… हाए कर्बला…
ये सिर्फ़ तारीख़ नहीं, हर इंसाफ़-पसंद दिल का दर्द है।
हाए हुसैन…
एक दर्द है…
हाए हुसैन…
हाए हुसैन…
हाए हुसैन…
घोड़े से सिर्फ़ एक जिस्म नहीं गिरा था…
उस दिन इंसानियत, हक़ और इंसाफ़ के सीने पर वार हुआ था।
कर्बला के मैदान में, रेत थी तपती हुई,
प्यासे थे हुसैन, पर रूह थी जगमगाती हुई।
आसमाँ भी रो पड़ा, ज़मीं काँप उठी थी,
ख़ून से तारीख़ ने इक सच्चाई लिखी थी।
सच्चाई लिखी थी…
हाए हुसैन! तुम्हारी क़ुर्बानी रुला देती है,
दिलों को झिंझोड़ के, इक आग जगा देती है।
ख़ून का हर क़तरा ये दर्स सिखाता है,
ज़ुल्म के आगे सर झुकाना, मौत कहलाता है।
हवाओं में आज भी, वो पुकार गूँजती है,
बातिल के सामने बस, इक़रार गूँजती है।
“सर कटा सकते हैं, पर सर झुका नहीं सकते,”
मोमिन की शान यही, हम भुला नहीं सकते।
ज़ुल्म के आगे सर झुकाना नहीं,
हक़ पे जाँ लुटाना ही, मोमिन का फ़ख़्र है।
मोमिन का फ़ख़्र है!
हाए हुसैन! तुम्हारी क़ुर्बानी रुला देती है,
दिलों को झिंझोड़ के, इक आग जगा देती है।
ख़ून का हर क़तरा ये दर्स सिखाता है,
ज़ुल्म के आगे सर झुकाना, मौत कहलाता है।
हाए हुसैन… हाए कर्बला…
ये सिर्फ़ तारीख़ नहीं, हर इंसाफ़-पसंद दिल का दर्द है।
हाए हुसैन…
एक दर्द है…
हाए हुसैन…
हाए हुसैन…
हाए हुसैन…